समाज की सच्चाई को बयां करती हैं फिल्म नक्काश, सोचने पर कर देगी मजबूर

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फिल्म नक्काश में तीन किरदार अहम हैं। पहला अल्ला रखा सिद्दिकी (इनामुलहक), दूसरा पुजारी वेदांत जी (कुमुद मिश्रा), अल्ला रखा का जिगरी दोस्त समद (शारिब हाशमी)। अल्ला रखा के पूर्वज सालों से मंदिरों की नक्काशी करते आ रहे होते है।

समाज को धर्म पर बांटने की राजनीति सालों से होती आ रही है। इस धार्मिक राजनीति में कई मासूमों को अपनी जान गवानी पड़ती है तो कई लालची राजनेता लाशों पर राजनीति करने पहुंच जाते हैं। ये सिलसिला सालों से चलता आ रहा है। इसी मुद्दे को उठाते हुए निर्देशक जैगम इमाम ने फिल्म ‘नक्काश’ को तैयार किया है। फिल्म हिंदू- मुस्लिम के बीच पनपाई जाने वाली नफरत की कहानी हैं। फिल्म में दिखाया गया हैं कि कैसे कुछ राजनीतिक तत्व मिलकर दोनों धर्म के लोगों को आपस में लड़ाकर राजनीतिक रोटियां सेकते हैं।

फिल्म ‘नक्काश’ की कहानी
‘अल्लाह और भगवान इंसान के बीच फर्क नहीं करते। इंसान के बीच फर्क करता है इंसान। फिल्म का ये डायलोग फिल्म के अंश को बया करता है। फिल्म नक्काश में तीन किरदार अहम हैं। पहला अल्ला रखा सिद्दिकी (इनामुलहक), दूसरा पुजारी वेदांत जी (कुमुद मिश्रा), अल्ला रखा का जिगरी दोस्त समद (शारिब हाशमी)। अल्ला रखा के पूर्वज सालों से मंदिरों की नक्काशी करते आ रहे होते है। अल्ला रखा भी इसी काम के लिए पहचांना जाता हैं। बनारस के मंदिर के पुजारी वेदांत जी, अल्ला रखा को काफी मानते हैं, उसके को देखते हुए उसे मंदिर के गर्भग्रह की नक्काशी का काम सौंप देते हैं। अल्ला रखा और वेदांत जी हिंदू-मुस्लिम नहीं मानते वो बस काम को काम और इंसान को इंसान मानते हैं। अल्ला रखा का जिगरी दोस्त समद भी अहम रोल में है। समद अपने परिवार को पालने के लिए रिक्शा चलाता है। उसका बस एक ही सपना हैं कि वो अपने पिता की आखिरी इच्छा को पूरा करें। उसके पिता एक बार हज की यात्रा करना चाहते हैं।
फिल्म में वेदांत जी का बेटा मुन्ना भैया (पवन तिवारी) पुलिस इंस्पेक्टर राजेश शर्मा जैसे लोग मुस्लिमों से फिल्म में नफरत करते हैं। उनको अल्ला रखा का मंदिर में आकर काम करना पसंद नहीं होता। वहीं दूसरी तरफ अल्ला रखा को उसके समुदाय के लोग भी खासा पसंद नहीं करते क्योंकि वह हिंदूओं के मंदिर में काम करता है इसी लिए अल्ला रखा के बेटे मोहम्मद (हरमिंदर सिंह) को मदसे में एडमिशन नहीं दिया जाता। इसके बाद क्या होता हैं इसके लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।
फिल्म रिव्यू
फिल्म में किरदारों में कोई बड़ा नाम शामिल नहीं है लेकिन फिल्म में जिन कलाकरों को लिए गया हैं उन्होंने जबरदस्त अभिनय किया हैं। बाल कलाकार हरमिंदर सिंह के चहरे पर काफी मासूमियत हैं जो उनके दिरदार में जान डाल रहीं है। शारिब हाशमी एक अच्छे अभिनेता हैं फिल्म में उन्होंने अपने किरदार में जान डाल दी हैं। कुमुद मिश्रा ने वेदांत जी का किरदार प्रभावशाली ढ़ग से निभाया हैं। फिल्म के क्लाइमेक्स को और अच्छा हो सकता था लेकिन जो क्लाइमेक्स होता हैं वह भी अच्छा हैं। एक तरह से कह सकते हैं कि अगर आप सब्जेक्टिव फिल्में देखना पसंद करते है तो ये फिल्म आपको अच्छी लगेगी। लेखक-निर्देशक जैगम इमाम ने आज के दौर में समाज में फैली धार्मिक और सामाजिक वितृष्णा और घृणा को ध्यान में रखकर एक अच्छी नियत से फिल्म बनाई है। 

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