कोरोना ने इन मरीजों के सामने खड़ी कर दी जिंदा रहने की चुनौती, ये है बड़ी वजह

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कोरोना महामारी के कारण हुए लॉकडाउन ने थैलेसीमिया के मरीजों के सामने जिंदा रहने की चुनौती खड़ी कर दी है। इन मरीजों को लॉकडाउन में रक्तदाता नहीं मिल पा रहे हैं। उस पर बीआरडी में पर्याप्त सुविधा न मिल पाने के कारण मरीज या तो एसपीजीआई लखनऊ या फिर एम्स में इलाज के लिए जाते रहते हैं।

लॉकडाउन के चलते वह जा नहीं पा रहे हैं। ब्लड और दवा के लिए उन्हें निजी या फिर ट्रस्ट के अस्पतालों पर निर्भर रहना मजबूरी बन गई है, जो दवाएं एसपीजीआई में निशुल्क मिलं जाती थीं, अब उन्हीं दवाओं के लिए रुपये खर्च करने पड़ रहे है।

जेब के साथ उनकी जिदंगी भी लॉकडाउन में भारी हो गई है। इतना ही नहीं मरीजों को काफी मशक्कत कर रक्तदाताओं को ले जाना पड़ रहा है, तब जाकर उन्हें रक्त मिल पा रहा है। उस पर अब कोरोना जांच कराने का नियम उन्हें और भी तकलीफ दे रहा है। डॉक्टरों की मानें तो किसी मरीज को 15 दिन में तो किसी को 21 दिन में कम से कम दो यूनिट रक्त की जरूरत पड़ती है।
केस एक
बिहार के बगहा के रहने वाले सुधीर कुमार का बेटा थैलेसीमिया से पीड़ित है। वह एम्स दिल्ली में बेटे का इलाज कराते हैं। 26 फरवरी को वह एम्स बेटे को दिखाने गए थे। मार्च में डॉक्टरों ने बुलाया था, लॉकडाउन के नाते वहां जा नहीं पा रहे हैं। श्रीगुरु गोरक्षनाथ चिकित्सालय के ब्लड बैंक ने उनकी मदद की और बेटे को किसी तरह रक्त मिल सका है। बताते हैं कि अब तो लॉकडाउन में रक्तदाता ढूंढना मुश्किल हो गया है। डर के कारण लोग नहीं जा पा रहे हैं।

केस दो
बरगदवां के शक्तिनगर के रहने वाले राम मनोहर के बेटे को थैलेसीमिया की बीमारी है। वह भी एसजीपीआई में बेटे का इलाज कराते हैं। कहते हैं कि वहां आसानी से ब्लड मिल जाता है। लेकिन लॉकडाउन के कारण इस बार वहां भी रक्त चढ़ाने से मना कर दिया गया। मजबूरी में एक निजी अस्पताल में किसी तरह बहुत ढूंढने पर रक्तदाता मिला तो बेटे को रक्त मिला सका। इधर पिछले 20 दिन से दवाओं से काम चल रहा है।

यह अनुवांशिक बीमारी है, जो माता-पिता से आती है। इस बीमारी में चेहरा सूखने लगता है। बच्चे की तबीयत अक्सर खराब रहती है। साथ ही वजन भी नहीं बढ़ता है।
जिला अस्पताल फिजीशियन डॉ बीके सुमन ने बताया कि यह बच्चों को माता-पिता से अनुवांशिक तौर पर मिलने वाला रक्त-रोग है। इस बीमारी से शरीर में हीमोग्लोबिन के निर्माण में काफी दिक्कतें होती हैं। इसकी वजह से खून की कमी मरीज में हर 15 से 20 दिनो में दिखने लगत हैं। ऐसे में बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। इसकी पहचान तीन माह की उम्र के बाद ही पाती है।

बीआरडी मेडिकल कॉलेज प्राचार्य डॉ. गणेश कुमार ने बताया कि मेडिकल कॉलेज में इलाज की पूरी व्यवस्था है। बाल रोग विभाग में थैलेसीमिया के मरीजों के इलाज किया जाता है, जो भी मरीज आता है, यदि उसके साथ रक्तदाता नहीं है तो भी उसे रक्त दिया जाता है। कॉलेज में सभी दवाएं हमारे पास उपलब्ध हैं जो मरीजों को निशुल्क दी जाती हैं।

सार

  • लॉकडाउन में नहीं मिल रहे थैलीसीमिया मरीजों को रक्तदाता
  • जिले में करीब 300 मरीज, ज्यादातर एम्स और एसजीपीजीआई में करा रहे इलाज
  • रोज खरीदनी पड़ रही हजार रुपये से अधिक की दवाएं

विस्तार

कोरोना महामारी के कारण हुए लॉकडाउन ने थैलेसीमिया के मरीजों के सामने जिंदा रहने की चुनौती खड़ी कर दी है। इन मरीजों को लॉकडाउन में रक्तदाता नहीं मिल पा रहे हैं। उस पर बीआरडी में पर्याप्त सुविधा न मिल पाने के कारण मरीज या तो एसपीजीआई लखनऊ या फिर एम्स में इलाज के लिए जाते रहते हैं।

लॉकडाउन के चलते वह जा नहीं पा रहे हैं। ब्लड और दवा के लिए उन्हें निजी या फिर ट्रस्ट के अस्पतालों पर निर्भर रहना मजबूरी बन गई है, जो दवाएं एसपीजीआई में निशुल्क मिलं जाती थीं, अब उन्हीं दवाओं के लिए रुपये खर्च करने पड़ रहे है।

जेब के साथ उनकी जिदंगी भी लॉकडाउन में भारी हो गई है। इतना ही नहीं मरीजों को काफी मशक्कत कर रक्तदाताओं को ले जाना पड़ रहा है, तब जाकर उन्हें रक्त मिल पा रहा है। उस पर अब कोरोना जांच कराने का नियम उन्हें और भी तकलीफ दे रहा है। डॉक्टरों की मानें तो किसी मरीज को 15 दिन में तो किसी को 21 दिन में कम से कम दो यूनिट रक्त की जरूरत पड़ती है।

थैलेसीमिया के कारण व लक्षण
केस एक
बिहार के बगहा के रहने वाले सुधीर कुमार का बेटा थैलेसीमिया से पीड़ित है। वह एम्स दिल्ली में बेटे का इलाज कराते हैं। 26 फरवरी को वह एम्स बेटे को दिखाने गए थे। मार्च में डॉक्टरों ने बुलाया था, लॉकडाउन के नाते वहां जा नहीं पा रहे हैं। श्रीगुरु गोरक्षनाथ चिकित्सालय के ब्लड बैंक ने उनकी मदद की और बेटे को किसी तरह रक्त मिल सका है। बताते हैं कि अब तो लॉकडाउन में रक्तदाता ढूंढना मुश्किल हो गया है। डर के कारण लोग नहीं जा पा रहे हैं।

केस दो
बरगदवां के शक्तिनगर के रहने वाले राम मनोहर के बेटे को थैलेसीमिया की बीमारी है। वह भी एसजीपीआई में बेटे का इलाज कराते हैं। कहते हैं कि वहां आसानी से ब्लड मिल जाता है। लेकिन लॉकडाउन के कारण इस बार वहां भी रक्त चढ़ाने से मना कर दिया गया। मजबूरी में एक निजी अस्पताल में किसी तरह बहुत ढूंढने पर रक्तदाता मिला तो बेटे को रक्त मिला सका। इधर पिछले 20 दिन से दवाओं से काम चल रहा है।

यह अनुवांशिक बीमारी है, जो माता-पिता से आती है। इस बीमारी में चेहरा सूखने लगता है। बच्चे की तबीयत अक्सर खराब रहती है। साथ ही वजन भी नहीं बढ़ता है।

रक्त रोग है थैलेसीमिया
जिला अस्पताल फिजीशियन डॉ बीके सुमन ने बताया कि यह बच्चों को माता-पिता से अनुवांशिक तौर पर मिलने वाला रक्त-रोग है। इस बीमारी से शरीर में हीमोग्लोबिन के निर्माण में काफी दिक्कतें होती हैं। इसकी वजह से खून की कमी मरीज में हर 15 से 20 दिनो में दिखने लगत हैं। ऐसे में बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। इसकी पहचान तीन माह की उम्र के बाद ही पाती है।

बीआरडी मेडिकल कॉलेज प्राचार्य डॉ. गणेश कुमार ने बताया कि मेडिकल कॉलेज में इलाज की पूरी व्यवस्था है। बाल रोग विभाग में थैलेसीमिया के मरीजों के इलाज किया जाता है, जो भी मरीज आता है, यदि उसके साथ रक्तदाता नहीं है तो भी उसे रक्त दिया जाता है। कॉलेज में सभी दवाएं हमारे पास उपलब्ध हैं जो मरीजों को निशुल्क दी जाती हैं।

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